Saturday, 27 March 2021

फागुन आया गांव में



दहकी-दहकी दोपहर, बहकी-बहकी रात,
फागुन आया गांव में, लेकर ये सौगात।

प्रकृति में चारों तरफ उत्सव का माहौल है, फागुन आ गया है और अनंग अपने रंग में है। उसके पुष्प-धनुष से शरों का सन्धाान होने लगा है। मन के आकाश में खिलते हुए इन्द्रधनुष और दृष्टि के वातास में बिखरते हुए रंग साहित्य के दर्पण में भी प्रतिच्छवित हो रहे हैं -

खनक उठे हैं लाज के, बागी बाजूबन्द,
संयम के हर छन्द को, होने दो स्वच्छन्द।

आम के बौर को देखकर सहृदय कवि को प्रतीत होता है कि सहकार के ये वृक्ष गुलाबी शंख बजा रहे हैं और उनकी ध्वनि को सुनकर नौजवानों के दिलो की किताबों में सहेजकर रखे गए मोरपंख बाहर आने को अकुला उठे हैं। कभी उसे ऐसा भी लगता है कि फागुन के सैलाब ने समग्र परिवेश को अपने में निमज्जित कर लिया है और रातें रागवती तथा दिवस परागवन्त हो उठे हैं -

चढ़ा गांव दर गांव यूं, ये सैलाबी फाग,
राग-राग है रात हर, प्रात पराग-पराग।

हर कदम पर मोहक बिम्बों की चित्र-वीथी सजी है। चांदनी महुए की गंध की तरह प्राणों में उतरती है तो धूप नवोढ़ा की तरह चेतना में झिलमिलाती है -

मौसम की उच्छ्वास में है महुए की गन्ध,
टूट रहेंगे आज फिर संयम के तटबन्ध।
तथा -
भरे कलश में देह के, क्षीरसिन्धु सा रूप,
बैठी है वट के तले, घूंघट काढ़े धूप।

माथे पर गुलाल का टीका लगाये, आंखों में आत्मीयता भरी दृष्टि का उजास लिये, स्वागत में फैली बांहें और अधरों पर दीप्तिमती मुस्कान लिए उत्सव-पुरुष मुझे होलिकोत्सव के साकार उल्लास की तरह प्रतीत होता है। यश मालवीय याद आते हैं -

उत्सव के दिन आ गए, हंसे खेत-खपरैल,
एक हंसी में धुल गया, मन का सारा मैल।

उत्सव में ‘सव’ शब्द यज्ञ का वाचक है और ‘उत्’ उपसर्ग उध्र्वगमन का प्रतीक होता है। जो हमें ऊंचाई की तरफ न ले जाए, उदात्त न बनाए और यज्ञ अर्थात् समष्टि के हित से न जोड़े वह कैसा उत्सव ? होली अहम् की आहुति देने का, विराट के आलिंगन का और आत्मविसर्जन का महत् पर्व है। रंगों के माध्यम से जब हम स्वर्ग के इन्द्रधनुष को पृथ्वी पर उतार लाते हैं, जलती हुई होली में नवान्न की आहुति देते हुए जब हम व्यष्टि-चेतना को समष्टि चेतना से जोड़ते हैं और एक-दूसरे को बांहों में भरते हुए जब हम ‘एकोऽहम् बहुस्याम’ के लीलाभाव का साक्षात्कार करते हैं, तो हम सच्चे अर्थों में उत्सव की अर्थ-ध्वनियांे को पकड़ पाते हैं अन्यथा हर उत्सव एक औपचारिकता और हर अनुष्ठान एक कर्मकाण्ड बनकर रह जाता है। स्व. नजीर बनारसी कहा करते थे -

पूरा बरस पड़ा है समझ-बूझ के लिए,
इक दिन गुजार लीजिए दीवानेपन के साथ।
जब दिल न मिलने पाये तो मिलने से फायदा,
दिल का मिलन जरूरी है होली-मिलन के साथ।

फागुन की चरमोपलब्धि है होलिकोत्सव और रंग के इस त्योहार की सार्थकता तभी है जब मात्र बाहरी वस्त्र ही रंजित न हों, हमारी व्यक्ति सत्ता की पंचरंग चुनरी भी रंगों से सराबोर हो जाए और ये रंग इतने 
गाढे चढ़ें कि न ये साल भर छूटं और न इन्हें छुड़ाने का मन हो।

 डाॅ॰ शिव ओम अम्बर



Monday, 15 February 2021

वीणा वादिनी वर दे


                                           
वसंत पंचमी भगवती सरस्वती का आविर्भाव दिवस है।  महाप्राण  निराला ने  इसी तिथि को अपनी ही नहीं हर कवि  की भावमयी जन्मतिथि घोषित किया था. उनकी सुप्रसिद्ध वाणी -वंदना यद्यपि परतंत्रता के कालखंड में लिखी गई थी।  किन्तु उसमे नवीन भारत के भव्य और दिव्य स्वरूप की परिकल्पना करते हुए प्रार्थना की गई थी -

नव गति नव लय  ताल छंद नव 
नवल कंठ नव जलद  मन्द्र  रव 
नव नभ विहग वृन्द को 
नव पर नव स्वर दे -
वीणा वादिनी वर दे। 

वीणा वादिनी सरस्वती का रूप जीवन को सही ढंग से जीने का दीक्षा मन्त्र है।  उनके एक हाथ में जपमाला है जो सतत साधना की प्रतीक है         ( यज्ञाना जपयज्ञोSस्मि - श्री  मद्भाभगवतगीता ) और एक हाथ में पुस्तक है जो शब्द की सत्ता और महत्ता को निरूपित करती है।  उनकी वीणा संगीत की सुप्रतिष्ठा को ध्वनित करती है।  सरस्वती नाद  ब्रह्म का कलात्मक रेखांकन है। वह सिद्धि रूप भी है और साधना - पथ की निर्देशिका भी।  जल-थल  और नभ में संचरण करने में समर्थ उनका वाहन हंस नीर -क्षीर विवेक का रूपक है तो उनका श्वेत कमलासन जीवन की सात्विक भूमिका और भंगिमा का रूपायन है।  सरस्वती का अवतरण पर्व निःशब्द  विश्व में शब्द की रसवंत सत्ता का स्वस्तिमय संघोष है। 
स्वयं वसंत कुसुमों का आकर अर्थात आश्रय -स्थल है। भगवन श्री कृष्ण ने गीता में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए  स्वयं को ऋतुओं में वसंत घोषित किया है। 
पुष्पों का परिसंग्रह वसंत अपनी अस्मिता में एक जीवन दर्शन है क्योंकि एक पुष्प मात्र पुष्प ही नहीं है, वह अपने आप में एक लम्बी कथा - यात्रा का अंतिम अध्याय है। बीज की कामना अंकुर बनती है, अंकुर की आराधना वृंत में बदलती है, वृं त की उपासना  पुष्प का रूप ग्रहण करती है और पुष्प की प्रार्थना सुंगध बनकर वतास मा व्याप्त हो जाती है। प्रकृति की महत लीला में पुष्प कामना के प्रार्थना में परिवर्तित होने का जीवंत दृष्टांत और पुष्पों के संभार का आगार बनने वाला वसंत वस्तुतः प्रकृति के अभिनंदन का अक्षर - पर्व है। वसंत और वागीश्वरी दोनों पर ही हिन्दी साहित्य में प्रभूत मात्रा में रचनाएं है।  बनन में  बागन में बरयों वसंत है से लेकर वीरों का कैसा हो वसंत  तक अनेकानेक  उदगार अपनी विविधवर्णी भंगिमाओं से साहित्य के भंडार को समृद्ध करने वाली उद्भ भावनाएं है। सरस्वती - वंदना से तो लगभग हर कवि अपनी काव्य - यात्रा प्रारंभ करता ही है। इधर लिखी गई  वंदना ओ में परम्परागत स्वर से अलग हटकर भी कुछ भाव व्यंजनाएं ऐसी सामने आई है जो रेखांकित करने योग्य है।श्रद्धेय रमानाथ अवस्थी जी की अभिव्यक्ति है - 

वीणा को छोड़ 
आज छेड़ अग्नि वीणा 
कोई तो कहीं नई आज गुनगुनाएं।

कविवर बुद्धिनाथ मिश्र की सरस्वती वंदना वाणी को एक वत्सला वृद्धा माँ के रूप में चित्रित करती हुई एक अलग ही बिम्ब उभारती है  -

अपनी चिट्ठी बूढी माँ मुझसे लिखवाती है 
जो भी मै लिखता हूँ 
वह कविता हो जाती है। 
कभी -कभी जब भूल विधाता की 
मुझको छेड़े ,
मुझे मुरझता देख 
दिखाती सपने बहुतेरे 
कहती तुम हो युग के सर्जक 
बेहतर ब्रह्मा से 
नीर- क्षीर करने वाले 
हो तुम्ही हंस मेरे। 
फूलों से भी कोमल 
शब्दों से सहलाती है 
मुझे बिठाकर राजहंस पर 
सैर कराती है। 

आज इन्ही पंक्तियों के साथ माँ को प्रणाम करता हूँ। 


                                                                        डॉ  शिव ओम  अम्बर